छोटी कास्ट वाली फिल्म के खरीदार नहीं- विनोद कापड़ी

पब्लिक व्यू, ब्यूरो 1/1/1900 12:00:00 AM
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‘मिस टनकरपुर हाजिर हो ’ और ‘ कान्ट टेक दिस शिट एनीमोर ‘ जैसी राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त फिल्म बनाने वाले निर्देशक विनोद कापड़ी के साथ वरिष्ठ पत्रकार रवि शंकर शर्मा जी की खासबातचीत ग्रामीण और आंचलिक परिवेश में आज भी वही आदिम व्यवस्था- प्रधान और पुलिस की रोंगटे खड़ी कर देने वाली क्रूरता तो पंचायत द्वारा अपने आपको देश के शीर्ष कोर्ट से भी ऊपर समझ कर ऐसे फैसले सुनाना, जो कि अमानवीय होने के साथ-साथ मानव की तुच्छ बुद्धि की समझ से परे हों, वह भी चंद सिक्कों के लिए... और जब एक निर्देशक इसे बड़े पर्दे के माध्यम से जन सामान्य के सामने लाना चाहता हो तो उसे दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हों, महज इसलिए कि उसकी फिल्म की कास्ट में शाहरुख और सोनाक्षी जैसे नाम न हों तो बॉलीवुड की लाचारी पर भी आंसू बहाने को दिल करता है। यह सब हुआ “ मिस टनकपुर हाजिर हो “ जैसी फिल्म बनाने वाले युवा निर्देशक विनोद कापड़ी के साथ। देश की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था पर करारा तंज करने वाली इस फिल्म को बनाने के बाद कापड़ी कई फिल्म निर्देशकों के चक्कर लगाते रहे कि एक बार वे उनकी फिल्म देख भर लें, पर सबने फिल्म की कास्ट सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ ली। अंत में पूरे डेढ़ साल बाद जाने-माने फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकार ने न केवल इसे देखा, बल्कि इसकी सराहना करते हुए लोगों से इसे देखने का आग्रह भी किया। वहीं राजू हिरानी ने इसे ‘ यूनीक ’फिल्म बताया और इसके बाद तो फिल्म ने बॉक्स ऑफिस सफलता हासिल कर ही दम लिया। पिछले दिनों फिल्म एंड आर्ट्स गिल्ड ऑफ उत्तराखंड के सौजन्य से जब हल्द्वानी में ‘ मिस टनकपुर हाजिर हो ‘ फिल्म का प्रदर्शन हुआ तो निर्देशक कापड़ी से बातचीत भी हुई। इस दरमियान उन्होंने फिल्म को लेकर तमाम रोचक बातें सामने रखीं तो इस बात पर गहरा दुख भी जताया कि आज लोग कास्ट देख कर फिल्म का मूल्यांकन करते हैं। भैंस के साथ बलात्कार जैसे अकल्पनीय विषय पर फिल्म बनाने का विचार कैसे आया ? प्रश्न पर कापड़ी ने बड़ी संजीदगी से बताया कि उन्होंने बीबीसी ऑनलाइन चैनल पर खबर देखी- भैंस के साथ यौनाचार में युवक को पांच साल की सजा। यह देखकर वह अचंभित रह गए। इस तरह की बातें यदा-कदा सामने तो आती रहतीं थीं, पर बीबीसी जैसे विश्वसनीय चैनल पर खबर देख कर वह शांत नहीं बैठ सके। फिर सीधे उस गांव जा पहुंचे, जहां यह घटना हुई थी और पूरी तहकीकात की। तभी उनके दिमाग में यह फिल्मबनाने का विचार कौंधा। अन्नू कपूर, रवि किशन, ओम पुरी, संजय मिश्र और ऋषिता भट्ट जैसे कलाकारों को लेकर फिल्म तो बना डाली, लेकिन कोई भी बड़ा डायरेक्टर या वितरक इसे देखने तक को तैयार नहीं हुआ। बड़ी जद्दोजहद के बाद आखिर डेढ़ साल बाद इसे रिकगनिशन मिली। फिल्म में कॉमेडी का तड़का इतनी सफाई से लगाया गया है कि फिल्म अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है। लेकिन ये कॉमेडी भी व्यंग्य को और पैना ही करती है। समाचार चैनलों के 23 वर्ष के चमकदार करियर को छोड़कर फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे कापड़ी ने फिल्म का ताना-बाना हरियाणा के गांव टनकपुर के इर्द-गिर्द ही बुना है। लेकिन फिल्म का नाम उत्तराखंड के टनकपुर पर ही रखा है। आखिर यही नाम उन्हें क्यों भाया, मिस रामनगर या मिस नैनीताल क्यों नहीं ? इस पर कापड़ी ने एक पल के लिए सोचा फिर बोले- दरअसल मैं पिथौरागढ़ के बेरीनाग का रहने वाला हूं। पहले जब बाहर से आते थे तो बेरीनाग के लिए टनकपुर से ही बस मिलती थी। इसलिए रात में आकर टनकपुर रुकते थे और अगले दिन सुबह बेरीनाग के लिए बस पकड़ते थे। तभी सोच लिया था कि फिल्म की मुख्य पात्र भैंस का नाम मिस टनकपुर ही रखूंगा। साथ ही कापड़ी ने मुस्कुराते हुए बताया- वैसे भी टनकपुर नाम में एक खनक है, आपको नहीं लगता- साथ ही प्रतिप्रश्न भी कर डाला। फिल्म में ‘ सैटायर ’ की पराकाष्ठा वहां पर हो जाती है, जब गांव की पंचायत युवक की शादी उस भैंस से कराने का फरमान जारी कर देती है, जिसके साथ उस पर दुराचार करने का आरोप है, अन्यथा उनका हुक्का-पानी बंद। मरता क्या न करता युवक की बरात आती है, भैंस से शादी की तैयारी होती है, लेकिन जब भैंस को मंडप में लाने को कहा जाता है तो वो बेतहाशा भाग निकलती है। आखिर भैंस की रस्सी किसने खोली ? सवाल के जवाब पर कापड़ी बेसाख्ता हंसते हुए कहते हैं- ये मुझे भी नहीं पता कि भैंस की रस्सी किसने खोली। फिल्म में भी यह रहस्य बरकरार रहता है और इसी पर फिल्म का एंड होता है। फिल्म के अंत में क्या ये नहीं हो सकता था कि प्रधान की युवा पत्नी कोर्ट में आकर कहती कि उसके प्रेमी ने भैंस से कुकर्म जैसा कोई कार्य नहीं किया है अथवा हीरो ही सामने आकर अपनी बात रखता- इस पर कापड़ी ने कहा, ‘ मुझसे कई लोगों ने यह सवाल किया कि आखिर घटना को लेकर हीरो-हीरोइन शांत क्यों रहे ?, लेकिन चूंकि फिल्म का पूरा परिवेश ग्रामीण था, इसलिए मुझे नहीं लगा कि महिला अपने पति अथवा समाज से बगावत कर पाती, इसी कारण हीरो भी आगे नहीं आ सका। ‘ कापड़ी ने एक मजेदार बात बताई कि फिल्म के एक डायलॉग –“ एक वकील करना दस रंडियों को रखने के बराबर है “ पर सेंसर ने कैंची चला दी और कहा कि यदि ये सेंटेंस रखना है तो फिल्म को ए सर्टिफिकेट देंगे- इस पर उन्होंने दस रंडियों की जगह दस हाथियों कर दिया। उत्तराखंड की समस्याओं से वह अवगत ही होंगे, उस पर फिल्म क्यों नहीं बनाते ? पूछने पर कापड़ी ने कहा- हां वह इस पर जरूर फिल्म बनाएंगे। जाते-जाते बताया कि अगली फिल्म केवल एक किरदार को लेकर बना रहे हैं, जो कि भारत क्या पूरे विश्व में अनूठी होगी। यह फिल्म भी एक दो साल की बच्ची पर है, जो कि बोल भी नहीं पाती। - रवि शंकर शर्मा अध्यक्ष पत्रकारिता विभाग, बीएमएम इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन, हल्द्वानी

छोटी कास्ट वाली फिल्म के खरीदार नहीं- विनोद कापड़ी

पब्लिक व्यू, ब्यूरो 1/1/1900 12:00:00 AM
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‘मिस टनकरपुर हाजिर हो ’ और ‘ कान्ट टेक दिस शिट एनीमोर ‘ जैसी राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त फिल्म बनाने वाले निर्देशक विनोद कापड़ी के साथ वरिष्ठ पत्रकार रवि शंकर शर्मा जी की खासबातचीत ग्रामीण और आंचलिक परिवेश में आज भी वही आदिम व्यवस्था- प्रधान और पुलिस की रोंगटे खड़ी कर देने वाली क्रूरता तो पंचायत द्वारा अपने आपको देश के शीर्ष कोर्ट से भी ऊपर समझ कर ऐसे फैसले सुनाना, जो कि अमानवीय होने के साथ-साथ मानव की तुच्छ बुद्धि की समझ से परे हों, वह भी चंद सिक्कों के लिए... और जब एक निर्देशक इसे बड़े पर्दे के माध्यम से जन सामान्य के सामने लाना चाहता हो तो उसे दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हों, महज इसलिए कि उसकी फिल्म की कास्ट में शाहरुख और सोनाक्षी जैसे नाम न हों तो बॉलीवुड की लाचारी पर भी आंसू बहाने को दिल करता है। यह सब हुआ “ मिस टनकपुर हाजिर हो “ जैसी फिल्म बनाने वाले युवा निर्देशक विनोद कापड़ी के साथ। देश की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था पर करारा तंज करने वाली इस फिल्म को बनाने के बाद कापड़ी कई फिल्म निर्देशकों के चक्कर लगाते रहे कि एक बार वे उनकी फिल्म देख भर लें, पर सबने फिल्म की कास्ट सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ ली। अंत में पूरे डेढ़ साल बाद जाने-माने फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकार ने न केवल इसे देखा, बल्कि इसकी सराहना करते हुए लोगों से इसे देखने का आग्रह भी किया। वहीं राजू हिरानी ने इसे ‘ यूनीक ’फिल्म बताया और इसके बाद तो फिल्म ने बॉक्स ऑफिस सफलता हासिल कर ही दम लिया। पिछले दिनों फिल्म एंड आर्ट्स गिल्ड ऑफ उत्तराखंड के सौजन्य से जब हल्द्वानी में ‘ मिस टनकपुर हाजिर हो ‘ फिल्म का प्रदर्शन हुआ तो निर्देशक कापड़ी से बातचीत भी हुई। इस दरमियान उन्होंने फिल्म को लेकर तमाम रोचक बातें सामने रखीं तो इस बात पर गहरा दुख भी जताया कि आज लोग कास्ट देख कर फिल्म का मूल्यांकन करते हैं। भैंस के साथ बलात्कार जैसे अकल्पनीय विषय पर फिल्म बनाने का विचार कैसे आया ? प्रश्न पर कापड़ी ने बड़ी संजीदगी से बताया कि उन्होंने बीबीसी ऑनलाइन चैनल पर खबर देखी- भैंस के साथ यौनाचार में युवक को पांच साल की सजा। यह देखकर वह अचंभित रह गए। इस तरह की बातें यदा-कदा सामने तो आती रहतीं थीं, पर बीबीसी जैसे विश्वसनीय चैनल पर खबर देख कर वह शांत नहीं बैठ सके। फिर सीधे उस गांव जा पहुंचे, जहां यह घटना हुई थी और पूरी तहकीकात की। तभी उनके दिमाग में यह फिल्मबनाने का विचार कौंधा। अन्नू कपूर, रवि किशन, ओम पुरी, संजय मिश्र और ऋषिता भट्ट जैसे कलाकारों को लेकर फिल्म तो बना डाली, लेकिन कोई भी बड़ा डायरेक्टर या वितरक इसे देखने तक को तैयार नहीं हुआ। बड़ी जद्दोजहद के बाद आखिर डेढ़ साल बाद इसे रिकगनिशन मिली। फिल्म में कॉमेडी का तड़का इतनी सफाई से लगाया गया है कि फिल्म अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है। लेकिन ये कॉमेडी भी व्यंग्य को और पैना ही करती है। समाचार चैनलों के 23 वर्ष के चमकदार करियर को छोड़कर फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे कापड़ी ने फिल्म का ताना-बाना हरियाणा के गांव टनकपुर के इर्द-गिर्द ही बुना है। लेकिन फिल्म का नाम उत्तराखंड के टनकपुर पर ही रखा है। आखिर यही नाम उन्हें क्यों भाया, मिस रामनगर या मिस नैनीताल क्यों नहीं ? इस पर कापड़ी ने एक पल के लिए सोचा फिर बोले- दरअसल मैं पिथौरागढ़ के बेरीनाग का रहने वाला हूं। पहले जब बाहर से आते थे तो बेरीनाग के लिए टनकपुर से ही बस मिलती थी। इसलिए रात में आकर टनकपुर रुकते थे और अगले दिन सुबह बेरीनाग के लिए बस पकड़ते थे। तभी सोच लिया था कि फिल्म की मुख्य पात्र भैंस का नाम मिस टनकपुर ही रखूंगा। साथ ही कापड़ी ने मुस्कुराते हुए बताया- वैसे भी टनकपुर नाम में एक खनक है, आपको नहीं लगता- साथ ही प्रतिप्रश्न भी कर डाला। फिल्म में ‘ सैटायर ’ की पराकाष्ठा वहां पर हो जाती है, जब गांव की पंचायत युवक की शादी उस भैंस से कराने का फरमान जारी कर देती है, जिसके साथ उस पर दुराचार करने का आरोप है, अन्यथा उनका हुक्का-पानी बंद। मरता क्या न करता युवक की बरात आती है, भैंस से शादी की तैयारी होती है, लेकिन जब भैंस को मंडप में लाने को कहा जाता है तो वो बेतहाशा भाग निकलती है। आखिर भैंस की रस्सी किसने खोली ? सवाल के जवाब पर कापड़ी बेसाख्ता हंसते हुए कहते हैं- ये मुझे भी नहीं पता कि भैंस की रस्सी किसने खोली। फिल्म में भी यह रहस्य बरकरार रहता है और इसी पर फिल्म का एंड होता है। फिल्म के अंत में क्या ये नहीं हो सकता था कि प्रधान की युवा पत्नी कोर्ट में आकर कहती कि उसके प्रेमी ने भैंस से कुकर्म जैसा कोई कार्य नहीं किया है अथवा हीरो ही सामने आकर अपनी बात रखता- इस पर कापड़ी ने कहा, ‘ मुझसे कई लोगों ने यह सवाल किया कि आखिर घटना को लेकर हीरो-हीरोइन शांत क्यों रहे ?, लेकिन चूंकि फिल्म का पूरा परिवेश ग्रामीण था, इसलिए मुझे नहीं लगा कि महिला अपने पति अथवा समाज से बगावत कर पाती, इसी कारण हीरो भी आगे नहीं आ सका। ‘ कापड़ी ने एक मजेदार बात बताई कि फिल्म के एक डायलॉग –“ एक वकील करना दस रंडियों को रखने के बराबर है “ पर सेंसर ने कैंची चला दी और कहा कि यदि ये सेंटेंस रखना है तो फिल्म को ए सर्टिफिकेट देंगे- इस पर उन्होंने दस रंडियों की जगह दस हाथियों कर दिया। उत्तराखंड की समस्याओं से वह अवगत ही होंगे, उस पर फिल्म क्यों नहीं बनाते ? पूछने पर कापड़ी ने कहा- हां वह इस पर जरूर फिल्म बनाएंगे। जाते-जाते बताया कि अगली फिल्म केवल एक किरदार को लेकर बना रहे हैं, जो कि भारत क्या पूरे विश्व में अनूठी होगी। यह फिल्म भी एक दो साल की बच्ची पर है, जो कि बोल भी नहीं पाती। - रवि शंकर शर्मा अध्यक्ष पत्रकारिता विभाग, बीएमएम इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन, हल्द्वानी

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