यूपी चुनाव: चेहरों से नहीं सोशल इंजीनियरिंग से मिलती है सफलता

पब्लिक व्यू ब्युरो 1/1/1900 12:00:00 AM
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चेहरों से ज्यादा सारा खेल सियासी और सामाजिक समीकरणों का रहा है। समीकरण फिट बैठे तो चेहरे हीरो बन गए। समीकरण गड़बड़ाए तो हीरो से जीरो बन गए। चर्चा तो बने, लेकिन चुनौती नहीं बन पाए। जाहिर है शीला दीक्षित हों या संजय सिंह अथवा किसी पार्टी का कोई और नेता, सिर्फ चेहरे के सहारे यूपी के चुनावी समर में सफलता मिलना तय नहीं है। अतीत का घटनाक्रम इसकी बानगी है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने यूपी के पार्टी के चेहरों को थका व पिटा मानते हुए 2012 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को आगे किया।उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित तो नहीं किया, लेकिन वे सारे संकेत दे दिए जिनसे यह संदेश चला जाए कि भाजपा सत्ता में आई तो उमा भारती ही मुख्यमंत्री होंगी। उमा यूपी वाली कही जाएं, इसके लिए न सिर्फ उनके लिए लखनऊ में आवास खरीदा गया बल्कि वे यहां से मतदाता भी बनीं।भगवा रणनीतिकारों की कोशिश उमा के जरिए कल्याण सिंह की नाराजगी से बिगड़े सामाजिक समीकरणों को भाजपा के अनुकूल बनाना था लेकिन सरकार बनाना तो दूर, पार्टी 50 विधायकों के आंकड़े तक भी न पहुंच पाई।

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